पलायन की मार से सूने पड़ रहे हैं गांव,घरों में लटक रहे हैं ताले बंजर पड़ रहे हैं खेत ,क्या हैं प्रमुख वजह,वरिष्ठ पत्रकार ममता शर्मा की मार्मिक रिपोर्ट जरूर पढ़िए
(वरिष्ठ पत्रकार ममता शर्मा की कलम से )
“बेडु पाको बारो मासा”, “घुघुती ना बासा” जैसे लोकगीतों में जिस उत्तराखंड के पहाड़ की तस्वीर दिखाई देती है, आज उसी पहाड़ के कई गांव पलायन की पीड़ा झेल रहे हैं। डांडा-कांठा, सीढ़ीनुमा खेत, देवदार के जंगल, गांव के आंगन और ढोल-दमाऊं की थाप पहाड़ की पहचान रहे हैं, लेकिन बदलते समय के साथ कई गांवों में घर तो हैं, मगर उनमें रहने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। कई मकानों के दरवाजों पर ताले हैं और खेत बंजर होने की ओर बढ़ रहे हैं।
ऐसे में पहाड़ की माटी जैसे अपने ही लोगों से सवाल कर रही है—“गांव खाली ह्वे ग्याना, कख जालुं हमारुं पहाड़?”
सीमा पर जवान, गांव में अस्तित्व की लड़ाई
उत्तराखंड को देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले वीर जवानों की भूमि के रूप में भी जाना जाता है। यहां का युवा सीमा पर खड़ा होकर देश की रक्षा करता है और मां अपने बेटे को तिरंगे की शान के लिए विदा करती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस पहाड़ ने देश को हजारों सैनिक दिए, उसी पहाड़ के गांव आज अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सीमा पर जवान देश की रक्षा के लिए खड़ा है तो गांव का युवा अपने परिवार के भविष्य की तलाश में गांव छोड़ने को मजबूर है। यह पलायन अपनी माटी से मोहभंग नहीं, बल्कि मजबूरी का परिणाम है।
पहाड़ में कही जाने वाली उक्ति—“पहाड़ कु पाणी अर पहाड़ की ज्वाणी, पहाड़ कै काम नि ऐंद”—आज पलायन की वास्तविक तस्वीर बयां करती है। पहाड़ का पानी नीचे चला जाता है और पहाड़ की जवानी रोजगार की तलाश में मैदानों व दूसरे प्रदेशों की ओर।
आंकड़ों में भी दिखाई देती है पलायन की गंभीर तस्वीर
उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2008 से 2018 के बीच प्रदेश की 6,338 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 लोगों ने आंशिक पलायन किया, जबकि 3,946 ग्राम पंचायतों से 1,18,981 लोगों ने स्थायी पलायन किया। इसी अवधि में 734 गांव, तोक और मजरों के गैर-आबाद होने की जानकारी सामने आई।
सरकारी अध्ययन में रोजगार और आजीविका की कमी को पलायन का सबसे बड़ा कारण बताया गया। करीब 50.16 प्रतिशत लोगों ने रोजगार की कमी, जबकि 15.21 प्रतिशत ने शिक्षा और 8.83 प्रतिशत लोगों ने स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को पलायन की वजह बताया।
यानी आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि पहाड़ के लोग अपनी माटी छोड़ना नहीं चाहते, लेकिन रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें उन्हें बाहर जाने के लिए मजबूर करती हैं।
खेती मुश्किल, बाजार दूर और जंगली जानवर बड़ी चुनौती
पहाड़ की खेती अपने आप में चुनौतीपूर्ण है। सीढ़ीनुमा खेत, छोटी जोत, सिंचाई की कमी, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और बाजार तक पहुंच की समस्या किसान की मुश्किल बढ़ाती हैं। इसके अलावा बंदर, जंगली सूअर और दूसरे वन्यजीव कई क्षेत्रों में किसानों की मेहनत पर पानी फेर देते हैं।
किसान महीनों मेहनत करके फसल तैयार करता है, लेकिन जब फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता या जंगली जानवर उसे नष्ट कर देते हैं तो खेती से आय का भरोसा टूटने लगता है।
ऐसे में पहाड़ का युवा सोचता है कि इतनी मेहनत के बाद भी यदि आमदनी निश्चित नहीं है तो देहरादून, हल्द्वानी या दूसरे राज्यों में नौकरी करना बेहतर है।
वह गांव से दुश्मनी करके नहीं जाता। उसके मन में बस यही होता है—“माटु त अपणी छ, गौं भी अपणु छ, पर बाल-बच्चन खातिर शहर मां रहणुं पड़दा।”
शिक्षा के लिए शुरू हुआ पलायन, बन जाता है स्थायी
शिक्षा भी पलायन की बड़ी वजह है। गांवों में प्राथमिक विद्यालय तो हैं, लेकिन हर जगह बेहतर माध्यमिक शिक्षा, विज्ञान, कंप्यूटर, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और उच्च शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसे में बच्चा पहले नजदीकी कस्बे में जाता है, फिर देहरादून, हल्द्वानी या किसी दूसरे शहर का रुख करता है। धीरे-धीरे परिवार भी उसके साथ शहर में बस जाता है और पढ़ाई के लिए शुरू हुआ पलायन स्थायी पलायन में बदल जाता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी यही कहानी कहती है। सामान्य बीमारी का उपचार गांव या आसपास मिल सकता है, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सक, जांच या गंभीर बीमारी के उपचार के लिए मरीज को दूर शहर ले जाना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों के लिए पहाड़ की दूरी कई बार बड़ी चुनौती बन जाती है।
सबसे ज्यादा जा रहा है गांव का युवा
पलायन का सबसे चिंताजनक पहलू युवाओं का गांव से बाहर जाना है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 42.25 प्रतिशत पलायनकर्ता 26 से 35 वर्ष की आयु के हैं।
यही उम्र गांव की खेती, रोजगार, सामाजिक जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। जब युवा गांव से बाहर चला जाता है तो पीछे बुजुर्ग और महिलाएं रह जाते हैं। धीरे-धीरे खेत खाली होने लगते हैं, घरों में ताले लग जाते हैं और गांव की रौनक खत्म होने लगती है।
गांव खाली होंगे तो लोकसंस्कृति भी कमजोर होगी
पलायन का असर सिर्फ अर्थव्यवस्था पर नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति पर भी पड़ रहा है। “बेडु पाको बारो मासा”, “घुघुती ना बासा”, झुमैला, चांचरी, छपेली, जागर और मांगल केवल गीत-संगीत नहीं, बल्कि पहाड़ की पीढ़ियों की स्मृति हैं।
सवाल यह है कि जब गांव खाली होंगे तो लोकगीत किसके लिए गाए जाएंगे?
जब आंगन में बच्चे नहीं होंगे तो मांगल की आवाज कौन सुनेगा? जब युवा गांव में नहीं होंगे तो झुमैला और चांचरी की टोली कौन बनाएगा? और जब बुजुर्ग नहीं रहेंगे तो लोककथाएं, कहावतें और पारंपरिक ज्ञान अगली पीढ़ी तक कौन पहुंचाएगा?
आज संस्कृति बचाने के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम होते हैं। मंच सजते हैं, ढोल-दमाऊं बजते हैं और तस्वीरें खिंचती हैं। लेकिन जिस गांव में यह संस्कृति जन्मी, वहां यदि रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य नहीं होंगे तो संस्कृति का मंच तो बच सकता है, लोकजीवन नहीं।
स्थानीय उत्पादों और पर्यटन में छिपा रोजगार का रास्ता
उत्तराखंड के गांवों में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, राजमा, फल, जड़ी-बूटी, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्र युवाओं को स्थानीय रोजगार दे सकते हैं।
जरूरत है स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग, प्रसंस्करण और ऑनलाइन बाजार से जोड़ने की। आज मंडुवा और झंगोरा जैसे पारंपरिक अनाज देशभर में स्वास्थ्यवर्धक खाद्य के रूप में लोकप्रिय हो रहे हैं। इसका सीधा लाभ पहाड़ के किसानों और युवाओं को मिलना चाहिए।
पर्यटन भी पलायन रोकने का मजबूत माध्यम बन सकता है। पर्यटकों को सिर्फ प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों तक सीमित रखने के बजाय गांवों से जोड़ना होगा। होमस्टे, स्थानीय भोजन, लोकगीत, हस्तशिल्प और ग्रामीण जीवन को पर्यटन से जोड़ा जाए तो पैसा सीधे गांव की अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
योजनाएं बहुत, लेकिन जमीन पर परिणाम जरूरी
सरकार ने पलायन की समस्या को गंभीरता से लेते हुए ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग का गठन किया है। स्वरोजगार, कृषि, बागवानी, पशुपालन, पर्यटन और कौशल विकास के क्षेत्र में योजनाएं भी संचालित की जा रही हैं।
लेकिन असली सवाल यही है कि इन योजनाओं का लाभ गांव तक कितना पहुंच रहा है?
पहाड़ का आदमी वर्षों से योजनाओं के नाम सुन रहा है। अब उसे घोषणाओं से ज्यादा परिणाम चाहिए। अगर योजनाएं कागजों पर चलती रहीं और जमीन पर रोजगार नहीं पहुंचा तो डर यही है कि योजना पूरी होने से पहले गांव ही खाली न हो जाएं।
चुनाव में याद आने वाले गांवों को पांच साल विकास चाहिए
पलायन के मुद्दे पर राजनीति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। चुनाव आते ही गांव नेताओं के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सड़क, रोजगार, अस्पताल और स्कूल के वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही कई गांव फिर इंतजार में खड़े दिखाई देते हैं।
गांव का बुजुर्ग शायद आज यही सवाल पूछे—
“वोट मांगण त पांच साल बाद आंण, पर सड़क, अस्पताल अर रोजगार कख जांदन?”
गांव को सिर्फ चुनाव के समय नहीं, पूरे पांच साल विकास चाहिए। सड़क हर मौसम में चाहिए, अस्पताल बीमारी के समय चाहिए, स्कूल बच्चे के भविष्य के लिए चाहिए और रोजगार पोस्टर पर नहीं, गांव की जमीन पर चाहिए।
पलायन रोकना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी
पलायन रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। सरकार को सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, इंटरनेट, बाजार और रोजगार की मजबूत व्यवस्था करनी होगी, वहीं समाज और युवाओं को भी स्थानीय अवसरों का उपयोग करना होगा।
देहरादून, हल्द्वानी और दूसरे शहरों में बसे पहाड़ के लोगों को भी अपने गांवों से दोबारा जोड़ना होगा। शहर में बस जाना अपनी माटी को भूल जाना नहीं है। दूरी हो सकती है, लेकिन रिश्ता नहीं टूटना चाहिए।
स्वास्थ्य के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को डॉक्टर, दवाइयों, जांच और एंबुलेंस जैसी सुविधाओं से मजबूत करना होगा। शिक्षा में अच्छे शिक्षक, छात्रावास, पुस्तकालय, कंप्यूटर, इंटरनेट और विज्ञान प्रयोगशालाओं की सुविधा विकासखंड स्तर तक पहुंचानी होगी।
युवाओं को प्रशिक्षण, आसान ऋण, तकनीकी सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जाए। खेती को केवल परंपरा नहीं, बल्कि लाभकारी व्यवसाय बनाया जाए।
तभी पहाड़ का युवा कह सकेगा—
“मैं अपणु गौं नी छोड़ुल, यहीं कुछ करुल।”
पहाड़ बचाना सिर्फ प्रदेश नहीं, राष्ट्र की जिम्मेदारी
देशभक्ति का अर्थ केवल सीमा पर तिरंगा लेकर खड़ा होना नहीं है। जिस पहाड़ ने देश को सैनिक दिए हैं, उस पहाड़ के गांवों को बचाना भी राष्ट्रनिर्माण है।
यदि आज गांव में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति का बीज बोया गया तो कल पहाड़ में फिर से आबादी, खेती और लोकगीतों की फसल उग सकती है। लेकिन यदि गांवों को सिर्फ चुनाव के समय याद किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब गांव में मकान तो होंगे, लेकिन उनमें रहने वाला कोई नहीं होगा।
खेत होंगे, लेकिन हल चलाने वाला कोई नहीं होगा। मंदिर होंगे, लेकिन पूजा करने वाले कम होंगे। लोकगीतों की किताबें होंगी, लेकिन उन्हें अपनी भाषा में गाने वाली पीढ़ी नहीं होगी।
इसलिए आज पहाड़ की माटी अपने भुला से पूछ रही है—
“माटु अपणी, गौं अपणु, डांडा-कांठा अपणा—फेर कख जालुं हमारुं भुला?”
और सरकार व जनप्रतिनिधियों से भी सवाल है—
“वोट मांगण खातिर पहाड़ तक पहुंचण वाली राजनीति, विकास पहुंचाण खातिर पांच साल तक क्यों नी पहुंच सकदी?”
इस सवाल का जवाब भाषणों से नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, स्थानीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति को बचाकर देना होगा।
क्योंकि आखिरकार—
“गांव बचला त लोकगीत बचला, लोकगीत बचला त हमरि भाषा अर संस्कृति बचली, अर हमरि संस्कृति बचली त उत्तराखंड की पहचान अर भारत की विविधता मजबूत रौली।”
“गांव खाली ह्वे ग्याना, कख जालुं हमारुं पहाड़?”
यह महज सवाल नहीं है। यह पहाड़ की माटी की पुकार है, खाली होते गांवों की आवाज है और आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़कर रखने का संकल्प भी।
