उत्तराखंड

डॉ. अंकित जोशी – Apnu Uttarakhand


देहरादून। राजकीय शिक्षक संघ की एससीईआरटी शाखा के निवर्तमान अध्यक्ष एवं प्रांतीय महामंत्री पद के प्रत्याशी डॉ. अंकित जोशी ने शिक्षा विभाग द्वारा विभागीय पोर्टल से शिक्षकों की सुगम-दुर्गम सेवा श्रेणी एवं सेवा विवरण हटाए जाने के निर्णय पर गहरी आपत्ति व्यक्त करते हुए इसे पारदर्शिता, सुशासन तथा शिक्षकों के वैधानिक अधिकारों के विरुद्ध बताया है। उन्होंने विभाग से इस निर्णय पर तत्काल पुनर्विचार करते हुए उक्त विवरण को पुनः सार्वजनिक करने की मांग की है।

डॉ. जोशी ने कहा कि उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य में सुगम, दुर्गम एवं अति दुर्गम क्षेत्रों का वर्गीकरण किसी औपचारिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और कठिन सेवा दशाओं को ध्यान में रखते हुए किया गया था। इस व्यवस्था का उद्देश्य वर्षों तक दुर्गम क्षेत्रों में सेवाएँ देने वाले शिक्षकों को स्थानांतरण सहित अन्य सेवा मामलों में न्यायसंगत अवसर उपलब्ध कराना था। ऐसे में इस सेवा विवरण को सार्वजनिक पोर्टल से हटाया जाना उन हजारों शिक्षकों के साथ अन्याय है जिन्होंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय दूरस्थ एवं कठिन क्षेत्रों में विद्यार्थियों के हित में समर्पित किया है।

उन्होंने कहा कि सुगम-दुर्गम सेवा विवरण केवल स्थानांतरण का आधार नहीं, बल्कि प्रत्येक शिक्षक के संपूर्ण सेवा अभिलेख का अभिन्न अंग है। यही विवरण भविष्य में स्थानांतरण, सेवा सत्यापन, न्यायालयीन वादों तथा अन्य प्रशासनिक निर्णयों में महत्वपूर्ण आधार बनता है। ऐसे महत्वपूर्ण अभिलेख को सार्वजनिक पोर्टल से हटाना प्रशासनिक पारदर्शिता की भावना के विपरीत है।

डॉ. जोशी ने कहा कि 24 जून 2026 को शासन द्वारा जारी आदेश में स्वयं यह स्वीकार किया गया है कि सुगम-दुर्गम के आधार पर स्थानांतरण का विषय माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इसी कारण शासन ने इस श्रेणी के आवेदनों पर अंतिम निर्णय लेने के बजाय कार्मिक एवं सतर्कता विभाग से मार्गदर्शन प्राप्त करने का निर्णय लिया है। ऐसे समय में विभाग द्वारा सुगम-दुर्गम सेवा विवरण को पोर्टल से हटाना न केवल अनावश्यक है, बल्कि इससे शिक्षकों के बीच भ्रम और आशंकाएँ भी उत्पन्न होती हैं।

उन्होंने कहा कि यदि शासन स्वयं इस विषय को विधिक रूप से विचाराधीन मान रहा है, तो विभाग का दायित्व और अधिक पारदर्शिता बनाए रखने का है। इसके विपरीत सेवा अभिलेखों को सार्वजनिक दृष्टि से हटाना यह संदेश देता है कि महत्वपूर्ण सूचनाओं तक शिक्षकों की पहुँच सीमित की जा रही है, जो सुशासन की भावना के अनुरूप नहीं है।

डॉ. जोशी ने कहा कि प्रदेश में हजारों शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने 20 से 30 वर्ष तक दुर्गम एवं अति दुर्गम क्षेत्रों में सेवा दी है, फिर भी वे आज तक सुगम क्षेत्र में स्थानांतरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे शिक्षकों के लिए उनकी दुर्गम सेवा का अभिलेख उनके अधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यदि यही विवरण सार्वजनिक पोर्टल से हटा दिया जाएगा तो स्वाभाविक रूप से वर्षों से कठिन परिस्थितियों में कार्यरत शिक्षकों का विभागीय व्यवस्था पर विश्वास प्रभावित होगा।

उन्होंने कहा कि यदि विभाग किसी तकनीकी अथवा प्रशासनिक कारण से पोर्टल में परिवर्तन करना चाहता था तो उसका स्पष्ट कारण सार्वजनिक किया जाना चाहिए था। किसी भी लोकतांत्रिक एवं उत्तरदायी प्रशासन में सूचना को हटाने के बजाय उसकी प्रामाणिकता एवं उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। पारदर्शिता का अर्थ केवल सूचना संकलित करना नहीं, बल्कि उसे संबंधित हितधारकों के लिए सुलभ बनाए रखना भी है।

डॉ. जोशी ने कहा कि संगठन किसी भी सकारात्मक सुधार का विरोधी नहीं है, किन्तु ऐसा कोई भी निर्णय स्वीकार नहीं किया जा सकता जिससे शिक्षकों के वैधानिक अथवा अर्जित अधिकार प्रभावित हों। विभाग को प्रत्येक निर्णय में शिक्षकों का विश्वास सर्वोपरि रखना चाहिए।

उन्होंने शासन एवं विभाग से निम्न मांगें कीं—

* शिक्षकों की सुगम-दुर्गम सेवा श्रेणी एवं सेवा विवरण तत्काल प्रभाव से विभागीय पोर्टल पर पुनः प्रदर्शित किए जाएँ।
* पोर्टल से उक्त विवरण हटाने के कारणों पर विभाग सार्वजनिक रूप से स्पष्ट स्पष्टीकरण जारी करे।
* प्रत्येक शिक्षक को अपनी सुगम-दुर्गम सेवा प्रविष्टियों के सत्यापन एवं त्रुटि संशोधन का अवसर प्रदान किया जाए।
*  उच्च न्यायालय में विचाराधीन वाद के अंतिम निर्णय तक सेवा अभिलेखों की पारदर्शिता पूर्णतः बनाए रखी जाए।
* स्थानांतरण प्रक्रिया पूर्णतः सत्यापित सेवा अभिलेखों, पारदर्शी मानकों एवं विधिक प्रावधानों के अनुरूप संचालित की जाए।

अंत में डॉ. जोशी ने कहा कि दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देना केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य के प्रति शिक्षकों की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। ऐसे शिक्षकों के सेवा अभिलेखों की सुरक्षा, पारदर्शिता और सम्मान सुनिश्चित करना शासन एवं विभाग की संवैधानिक, नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है। राजकीय शिक्षक संघ इस विषय को पूरी गंभीरता से शासन एवं विभाग के समक्ष उठाएगा तथा आवश्यकता पड़ने पर उपलब्ध सभी वैधानिक मंचों पर शिक्षकों के हितों की प्रभावी पैरवी करेगा।



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